अध्याय 8 – संस्कृत में लिङ्ग परिचय

लिङ्ग

परिभाषा लिङ्ग का शाब्दिक अर्थ जाति अथवा पहचान होता है। व्याकरण की दृष्टि से लिङ्ग उस गुण को कहते हैं, जिसके द्वारा किसी शब्द की पहचान तथा उसकी जाति का बोध होता है।
अर्थात् लिङ्ग से यह ज्ञात होता है कि कोई शब्द किस जाति या वर्ग में आता है।

संस्कृत मे लिङ्ग तीन प्रकार होते हैं —

(१) पुंलिङ्ग 

(२) स्त्रीलिङ्ग 

(३) नपुंसकलिङ्ग 

पुंलिङ्ग – शब्दों के जिस रूप से किसी व्यक्ति, स्थान या वस्तु की पुरुष जाति होने का बोध होता है, उसे पुंलिङ्ग कहा जाता है।

पुंलिङ्ग शब्द 

मोहन, राहुल, गुरु, बालक, आसन्द, मार्ग, मेघ, सागर, हस्त 

शब्दों का अर्थ 

आसन्द – आसन, मार्ग – सड़क,  सागर – समुद्र,  हस्त – हाथ

स्त्रीलिङ्ग – शब्दों के जिस रूप से किसी व्यक्ति, स्थान या वस्तु की स्त्री जाति होने का बोध होता है, उसे स्त्रीलिङ्ग कहा जाता है।

स्त्रीलिङ्ग शब्द 

सीता, कुन्ती, लक्ष्मी, मति, लेखनी, छात्रा, महिला, नदी, मातृ

शब्दों का अर्थ 

मति – बुद्धि, लेखनी – कलम, मातृ – माता 

नपुंसकलिङ्ग – वे शब्द जो न तो पुंलिङ्ग में आते हैं और न ही स्त्रीलिङ्ग में, उन्हें नपुंसकलिङ्ग कहा जाता है।

नपुंसकलिङ्ग शब्द 

यान, उपनेत्र, मित्र, द्वार, पुस्तक, दधि, वारि, जगत्, व्यजन, वातायन

शब्दों का अर्थ 

यान – गाड़ी, उपनेत्र – चश्मा, द्वार – दरवाजा, दधि – दही, वारि – जल, जगत् – संसार, व्यजन – पंखा, वातायन – खिड़की 

  • संस्कृत में दृश्य के आधार पर अर्थात देखकर या हिंदी शब्दों के लिङ्ग के आधार पर संस्कृत शब्दों के लिङ्ग का निर्धारण नहीं किया जा सकता ।

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