अध्याय 7 – संस्कृत वर्णमाला: वर्ण–संयोग और वर्ण–विच्छेद का सम्पूर्ण ज्ञान

वर्णमाला – किसी भी भाषा के सभी वर्णों के क्रमबद्ध समूह को वर्णमाला कहा जाता है। भाषा के समस्त शब्द और वाक्य इन्हीं वर्णों से निर्मित होते हैं। संस्कृत भाषा की वर्णमाला अत्यंत वैज्ञानिक और व्यवस्थित मानी जाती है।

संस्कृत में वर्ण मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं—

  1. स्वर
  2. व्यंजन

(१) स्वर – जिन वर्णों के उच्चारण में किसी अन्य वर्ण की सहायता नहीं लेनी पड़ती, उन्हें स्वर कहा जाता है। ये स्वतंत्र रूप से उच्चरित होते हैं, इसलिए इन्हें स्वतंत्र वर्ण भी कहा जाता है।

संस्कृत में कुल तेरह (13) स्वर वर्ण माने जाते हैं—
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ए, ऐ, ओ, औ

स्वर के भेद

स्वर तीन प्रकार के होते हैं—

(क) ह्रस्व स्वर

, , , ,

(ख) दीर्घ स्वर

आ, ई, ऊ, ॠ, ए, ऐ, ओ, औ

(ग) प्लुत स्वर

प्लुत स्वर का चिह्न ३ होता है—
अ३, आ३, इ३, उ३, ऋ३, ऌ३, ए३, ऐ३, ओ३, औ३

स्वर से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य

  • ए, ऐ, ओ तथा औ को संयुक्त या मिश्रित स्वर भी कहा जाता है।
  • ह्रस्व का अर्थ है छोटा। ह्रस्व स्वर का उच्चारण एक मात्रा में किया जाता है अर्थात एक बार पलक झपकने जितना समय में।
  • दीर्घ का अर्थ है बड़ा। दीर्घ स्वर का उच्चारण ह्रस्व से दुगुने समय में किया जाता है।
  • प्लुत स्वर एक चिह्न जो तीन (३) के जैसा होता है जो स्वर के साथ लगकर उन स्वरों को प्लुत बनाता है। प्लुत का अर्थ होता है त्रिमात्रिक अथवा तीन मात्राओं वाला, प्लुत स्वर का उच्चारण ह्रस्व स्वर के अपेक्षा तिगुना समय में किया जाना चाहिए। इसका प्रयोग किसी को पुकारने और ध्वनि को खींचने के लिए किया जाता है। जैसे – रा३म, ओ३म्
  • स्वर वर्णों को ‘अच्’ भी कहा जाता है।
  • प्लुत स्वर को गिनती में नहीं लिया जाता, किंतु उसे स्वर वर्ण माना जाता है।
  • लृ का दीर्घ रूप नहीं होता।

(२) व्यंजन – जिन वर्णों के उच्चारण में स्वर वर्णों की सहायता लेनी पड़ती है अथवा स्वर वर्णों को मिलाकर उच्चारण किये जाते हैं । उन्हें व्यंजन वर्ण कहा जाता है ।

संस्कृत में कुल तैंतीस (३३) व्यंजन होते हैं । जिन्हें तीन वर्गों में बाँटा गया है।

  • स्पर्श व्यंजन या वर्गीय व्यंजन
वर्गवर्णउच्चारण स्थान
क-वर्गक् ख् ग् घ् ङ्कण्ठ्य
च-वर्गच् छ् ज् झ् ञ्तालव्य
ट-वर्गट् ठ् ड् ढ् ण्मूर्धन्य
त-वर्गत् थ् द् ध् न्दन्त्य
प-वर्गप् फ् ब् भ् म्ओष्ठ्य
  • इन्हें स्पर्श व्यंजन इसलिए कहा जाता है क्योंकी इनका उच्चारण करते समय मुख के किसी भाग में मुख के किसी अङ्ग के द्वारा अवरोध या स्पर्श उत्पन्न होता है।

जैसे:

  • क से ङ तक के वर्णों का उच्चारण करते समय कण्ठ में अवरोध उत्पन्न होता है, इसलिए इन्हें कण्ठ्य व्यंजन कहा जाता है।
  • च से ञ तक के वर्णों का उच्चारण करते समय जीभ का मध्य भाग तालु (मुख की छत का अग्र भाग) को स्पर्श करता है, अतः ये तालव्य व्यंजन कहलाते हैं।
  • ट से ण तक के वर्णों का उच्चारण करते समय जीभ की नोक तालु के ऊपरी भाग अर्थात् मूर्धा (मुख की छत का मध्य भाग) से स्पर्श करती है, इसलिए ये मूर्धन्य व्यंजन कहलाते हैं।
  • त से न तक के वर्णों का उच्चारण करते समय जीभ दाँतों को स्पर्श करती है, इस कारण ये दन्त्य व्यंजन कहलाते हैं।
  • प से म तक के वर्णों के उच्चारण के समय दोनों होंठ परस्पर स्पर्श करते हैं, इसलिए इन्हें ओष्ठ्य व्यंजन कहा जाता है।

इसलिए उच्चारण के आधार पर इनको विशेष नाम भी दिया गया है।

  • वर्गीय व्यंजन के सभी पाँचों अंतिम वर्ण अनुनाशिका कहलाते हैं क्योंकि इनका उच्चारण विशेष स्थान के साथ-साथ नाक से भी किया जाता है।

जैसे –

कण्ठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दन्त्य, ओष्ठ्य

(ख) अन्तःस्थ व्यंजन

य्, र्, ल्, व्

(ग) ऊष्म व्यंजन

श्, ष्, स्, ह्

  • व्यंजन वर्णों के साथ प्रयुक्त चिह्न (्) को हलन्त चिह्न कहा जाता है। हलन्त का प्रयोग यह दर्शाने के लिए किया जाता है कि संबंधित व्यंजन स्वर रहित है। हलन्त युक्त व्यंजन का स्वतंत्र रूप से उच्चारण नहीं किया जा सकता।

जब किसी व्यंजन वर्ण के साथ कोई भी स्वर वर्ण जुड़ जाता है, तो उस व्यंजन से हलन्त स्वतः हट जाता है और वह व्यंजन स्वरयुक्त होकर उच्चारण योग्य बन जाता है।

उदाहरण—

  • क् + अ → क
  • क् + उ → कु
  • क् + ई → की
  • छ् + आ → छा
  • ट् + ऐ → टै
  • इस प्रकार हलन्त का प्रयोग व्यंजन को स्वर रहित दर्शाने तथा वर्णों के शुद्ध संयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • ऐसा नहीं है कि केवल व्यंजन वर्ण ही मुख के किसी अङ्ग के द्वारा बोले जाते हैं बल्कि स्वरवर्ण, अनुस्वार और विसर्ग भी मुख के किसी न किसी अङ्ग के द्वारा बोले जाते हैं ।

चलिए उनका उच्चारण स्थान भी जान लेते हैं ।

उच्चारण-स्थानउच्चारण-स्थान के वर्ण
कण्ठअ, आ, क, ख, ग, घ, ङ, ह, विसर्ग(ः)
तालुइ, ई, च, छ, ज, झ, ञ, य, श
मूर्धाऋ, ॠ, ट, ठ, ड, ढ, ण, र, ष
दन्तलृ, त, थ, द, ध, न, ल, स
ओष्ठउ, ऊ, प, फ, ब, भ, म
कण्ठ + तालुए, ऐ
कण्ठ + ओष्ठओ, औ
दन्त + ओष्ठ
नासिकाअनुस्वार (ं), ङ, ञ, ण, न, म

जब दो या दो से अधिक व्यंजन परस्पर मिलकर एक नवीन रूप धारण करते हैं और उनका संयुक्त रूप एक भिन्न व्यंजन के रूप में प्रकट होता है, तो उसे संयुक्त व्यंजन कहा जाता है। संयुक्त व्यंजन सामान्यतः व्यंजन-व्यंजन संयोग से बनते हैं।

उदाहरण—

  • (क् + ष्) + अ → क्ष
  • (त् + र्) + अ → त्र
  • (ज् + ञ्) + अ → ज्ञ
  • (प् + र्) + अ → प्र
  • व्यंजन को हल् भी कहा जाता है।
  • अयोगवाह – अनुस्वार (ं) तथा विसर्ग (ः) को संस्कृत व्याकरण में अयोगवाह कहा जाता है। इनका स्वतंत्र रूप से प्रयोग नहीं किया जाता है बल्कि किसी स्वर वर्ण के साथ प्रयोग किया जाता है । ये न तो स्वर होते हैं और न ही व्यंजन। यदि किसी शब्द में अनुस्वार के बाद वर्गीय व्यंजन आता है, तो अनुस्वार का उच्चारण उस वर्ग के अंतिम व्यंजन के समान किया जाता है।

जैसे –  संभव – सम्भव, अंक – अङ्क, दंत – दन्त

और यदि अनुस्वार के बाद कोई अवर्गीय व्यंजन आए तो ये देखते हैं की उस अवर्गीय व्यंजन का उचारण स्थान क्या है, उचारण स्थान देखने के बाद यह निश्चय करते हैं की उस स्थान से किस वर्गीय व्यंजन का उचारण होता है और फिर उसके अंतिम वर्ण के अनुसार, अनुस्वार का उचारण कर देते हैं।

जैसे –  अंश – अञ्श, संसार – सन्सार आदि।

यदि अनुस्वार के बाद संयुक्त व्यंजन हो जैसे क्ष, त्र, ज्ञ, श्र आदि तो अनुस्वार के उच्चारण करते समय यह देखते हैं की वह संयुक्त व्यंजन किन वर्णों से बना है और जो सबसे पहला वर्ण होगा उसी  उच्चारण स्थान के अनुसार उच्चारण करते हैं।  

  • विसर्ग (ः) – विसर्ग (ः) का उच्चारण सदैव ‘ह’ के समान किया जाता है, चाहे विसर्ग किसी भी स्वर के बाद आया हो। विसर्ग के उच्चारण में प्रायः यह त्रुटि की जाती है कि शब्द के अंत में प्रयुक्त स्वर के अनुसार उसका उच्चारण कर दिया जाता है, जो कि व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध है।

जैसे –

  • रामः → राम + ह
  • गुरु: → गुरु + ह (न कि गुरु + हु)
  • मति: → मति + ह (न कि मति + हि)

वर्ण – संयोग: वर्णों को परस्पर जोड़कर अर्थपूर्ण शब्द बनाने की प्रक्रिया को वर्ण–संयोग कहा जाता है। शब्द-निर्माण की यह प्रक्रिया भाषा की मूल संरचना को समझने में सहायक होती है।

जैसे –

1.  र् + आ + म् + अ → राम

2.  प् + उ + स् + त् + अ + क् + अ → पुस्तक

3.  क् + र् + अ + म् + अ → क्रम

वर्ण – विच्छेद: किसी शब्द के सभी वर्णों को पृथक–पृथक करके लिखने की प्रक्रिया को वर्ण–विच्छेद कहा जाता है। वर्ण–विच्छेद से शब्दों की आंतरिक संरचना तथा उनके मूल वर्णों की पहचान होती है।

शब्दवर्ण–विच्छेदशब्द का प्रकार
पुष्पप् + उ + ष् + प् + अअकारान्त शब्द
पृथ्वीप् + ऋ + थ् + व् + ईईकारान्त शब्द
राजन्र् + आ + ज् + अ + न्नकारान्त शब्द

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