मनुष्य अपने दैनिक जीवन में निरंतर भाषा का प्रयोग करता है। हम प्रतिदिन किसी से प्रश्न पूछते हैं, प्रश्नों के उत्तर देते हैं, किसी विषय पर जानकारी देते हैं, अनुमति लेते या देते हैं—ये सभी क्रियाएँ वाक्यों के माध्यम से सम्पन्न होती हैं। इस प्रकार हम प्रतिदिन सैकड़ों-हज़ारों वाक्यों का प्रयोग करते हैं।
वाक्य शब्दों के समूह से बनते हैं तथा शब्द वर्णों के समूह से। अतः किसी भी भाषा की सबसे छोटी इकाई, जिसे न तो और छोटा किया जा सकता है और न ही विभाजित किया जा सकता है, उसे अक्षर या वर्ण कहा जाता है।
मुख से उच्चरित विभिन्न ध्वनियों को अक्षर कहा जाता है तथा उन ध्वनियों को लिखित रूप में प्रकट करने के लिए जिन चिह्नों या प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें वर्ण कहा जाता है। अक्षर और वर्ण के बीच यह सूक्ष्म अंतर होते हुए भी सामान्यतः दोनों को समानार्थक रूप में प्रयोग किया जाता है।
संस्कृत भाषा में ‘अव्यय’ शब्दों को छोड़कर प्रत्येक शब्द का एक मूल रूप होता है। उस मूल रूप का सीधा प्रयोग वाक्य में नहीं किया जाता, बल्कि उससे विभिन्न रूप बनाए जाते हैं, जिनका प्रयोग वाक्य में किया जाता है।
संस्कृत व्याकरण में क्रिया के मूल रूप को धातु कहा जाता है, जबकि संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण आदि शेष सभी शब्दों के मूल रूप को प्रातिपदिक कहा जाता है।
प्रत्येक धातु से सभी लकारों में पुरुष (उत्तम, मध्यम, प्रथम) तथा वचन (एकवचन, द्विवचन, बहुवचन) के अनुसार नौ-नौ क्रियारूप बनते हैं।
इसी प्रकार संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण आदि शब्दों के साथ ‘ने, को, से, के द्वारा, के लिए, का/के/की, में, पर’ आदि संबंधों को व्यक्त करने के लिए विभक्ति रूपों का प्रयोग किया जाता है। विभक्तियों के कारण संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण शब्दों के वचन के अनुसार 21 रूप बनते हैं तथा सम्बोधन सहित कुल 24 रूप प्राप्त होते हैं।